"जी करता है"
जी करता है पंछी बन उड़ जाऊ,
उचाइयो तक जाकर उस नील गगन को छू पाऊ,
घूमू उस आजाद गगन में।, सबका मन हर्षाऊ
कलियाँ तो बहुत है इस दुनिया में , पर अपनी एक अलग पहचान बनाऊ
कुछ करू ऐसा जग में कि अपना नाम कर जाऊ
मक बाप का नाम रोशन करके , गर्व से उनको भर पाऊ
कभी जी करता है , सागर कि लहरें बन जाऊ
और उस सफलता के तट को बारम्बार छूती जाऊ
या फिर ऊचाई से बहते उस सुन्दर झरने से गिरकर
शीतल बहती नदिया संग मिलकर अपना लक्ष्य हासिल कर जाऊ \
कभी जी करता है , फलो कि मधुर सुगंध बनकर
सबको मंत्र मुग्ध कर जाऊ।
जीवन में खुशिया भरकर , सबको आनंदित कर जाऊ
या इंद्रधनुष बन कर बेरंग लोगो की दुनिया को सतरंगी कर जाऊ
जी करता है , कभी छत बनकर बेसहारो को सहारा दे पाउ
जो पार न कर पाये , उनका पुल बनकर नदिया पर कराऊ।
या कभी शीतल जल बनकर ,प्यासे की प्यास बुझाऊ।
या ठंडी ठंडी हवा बनकर में ,गर्मी से व्यथित लोगो को राहत पंहुचा पाऊ।
बुजुर्गो की लाठी बनकर में,ढेर सारा आशीर्वाद पाऊ
या बच्चो का तोहफा बन उनके मन को हर्षाऊ।
जो रहते है दुखी , उनकी ख़ुशी बनकर मन को आनंद से भर जाउ ,
या रुमाल बनकर किसी के , आँसुओ को पूछ जाऊ।
पर डरता है मन मेरा भगवन कही बना न देना मुझको पैसा ,
कहीं किसी के घमंड का कारण न बन जाऊ
बना न देना मुझको वो ऐशो आराम ,
कि महनत क्या होती है वही भूल जाऊ।
किसी के खेतो कि फसल बनकर
हवा संग खूब झुमु और लहराऊ
चाँद सा सुन्दर मोती बनकर
किसी कि शोभा में बन जाऊ
या जगमग जगमग सितारा बनकर
सबसे तेज झिलमिलाऊ ,
या कोई मधुर धुन बनकर कानो में मिश्री सी घुल जाऊ।
- सौम्या अग्रवाल
TD -4
निफ्ट भोपाल
जी करता है पंछी बन उड़ जाऊ,
उचाइयो तक जाकर उस नील गगन को छू पाऊ,
घूमू उस आजाद गगन में।, सबका मन हर्षाऊ
कलियाँ तो बहुत है इस दुनिया में , पर अपनी एक अलग पहचान बनाऊ
कुछ करू ऐसा जग में कि अपना नाम कर जाऊ
मक बाप का नाम रोशन करके , गर्व से उनको भर पाऊ
कभी जी करता है , सागर कि लहरें बन जाऊऔर उस सफलता के तट को बारम्बार छूती जाऊ
या फिर ऊचाई से बहते उस सुन्दर झरने से गिरकर
शीतल बहती नदिया संग मिलकर अपना लक्ष्य हासिल कर जाऊ \
कभी जी करता है , फलो कि मधुर सुगंध बनकर
सबको मंत्र मुग्ध कर जाऊ।
जीवन में खुशिया भरकर , सबको आनंदित कर जाऊ
या इंद्रधनुष बन कर बेरंग लोगो की दुनिया को सतरंगी कर जाऊ
जी करता है , कभी छत बनकर बेसहारो को सहारा दे पाउ
जो पार न कर पाये , उनका पुल बनकर नदिया पर कराऊ।
या कभी शीतल जल बनकर ,प्यासे की प्यास बुझाऊ।
या ठंडी ठंडी हवा बनकर में ,गर्मी से व्यथित लोगो को राहत पंहुचा पाऊ।
बुजुर्गो की लाठी बनकर में,ढेर सारा आशीर्वाद पाऊ
या बच्चो का तोहफा बन उनके मन को हर्षाऊ।
जो रहते है दुखी , उनकी ख़ुशी बनकर मन को आनंद से भर जाउ ,
या रुमाल बनकर किसी के , आँसुओ को पूछ जाऊ।
पर डरता है मन मेरा भगवन कही बना न देना मुझको पैसा ,
कहीं किसी के घमंड का कारण न बन जाऊ
बना न देना मुझको वो ऐशो आराम ,
कि महनत क्या होती है वही भूल जाऊ।
किसी के खेतो कि फसल बनकर
हवा संग खूब झुमु और लहराऊ
चाँद सा सुन्दर मोती बनकर
किसी कि शोभा में बन जाऊ
या जगमग जगमग सितारा बनकर
सबसे तेज झिलमिलाऊ ,
या कोई मधुर धुन बनकर कानो में मिश्री सी घुल जाऊ।
- सौम्या अग्रवाल
TD -4
निफ्ट भोपाल
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