Straight from the core heart....

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Tuesday, April 3, 2012

कहाँ साहिल

कहाँ  साहिल  , कहां मज़िल |
कहां है जाँ, कहाँ है दिल |

जो देखूं गौर से तुझको,
तो बेगैरत हूं, आवारा |
जो न देखूं, तो कहती है,
मुझे बुज़दिल, मुझे बुज़दिल |

तेरे दीदार की ख़ातिर,
मैं खुद को रोक कर बैठा |
तू या तो इश्क-ए-वफ़ा दे दे,
या फिर कत्ल कर कातिल |

खुद मैने कब्र मे अपनी,
लिखा दी ‌घड़ी मरने की |
ख्वाहिश मे मिलाने की,
तेरा दिल और मेरा दिल....

दीपक त्रिपाठी
24/03/2012

क्या करें

हमारी नज़्म मे वो दर्द आता नहीं तो क्या करें,
दिल तोड़ कर बैठे हैं वफ़ा क्या करें ।

हमें तो धूप में भी छांव की ख्वाहिश नहीं,
तेरी जुल्फ़ों के साए की आशा क्या करें ।

खुशबू में तेरी बाहों की खोए इस तरह,
अब दिल बटोरें या दुआ करें ।

वफ़ा तुझसे ही नही, तेरी तस्वीर से भी है...
... अब उससे ही दर्द-ए-दिल बयां करें ।

तू दूर खुश है, खुश रह ’दीपक’,
अब नज़्म और सपनों मे हम जिया करें ।

                                                   -Deepak Tripathi