Straight from the core heart....

Straight from the core heart....

Sunday, January 1, 2017

 आज बारिश हुई थी
आज बरसा क्या था
   पानी तो नहीं था
तो क्या था ?
आज की रात भी न जाने कैसी होगी
जाग के काटनी होगी !

शिल्प तरंग

जीवन के दिन, छोटे सही, हम भी बड़े दिल वाले
कल की हमें, फ़ुर्सत कहाँ, सोचें जो हम मतवाले
जीने का रँगीन मौसम, ये खूबसूरत ज़माना
अपने यही चार पल हैं, आगे है क्या किसने जाना
जीना जिसे आता है वो, इनमें ही मौज मना ले
कल की हमें फ़ुर्सत कहाँ...
अपनी ज़िंदगी की भी कुछ यही कहानी है दोस्तो,
इस वर्ष के सफर की शुरुआत मे जो तथाकथित प्रेम के चलते ये आवारा मन कही ठहर सा गया था दूर देश मडराता भंवरा एक फूल की मादकता पर खो सा गया था, मग़र प्रकृती का नियम के अनुसार जो खिलता है वो एक दिन मुरझा जाता है बस उस पुष्प के मुरझाने से शुरुआती सपनो की नगरी मुम्बई का सफर रास नहीं आया !
शिर्दी के साई , त्रियांकेश्वर दर्शन से मन पावन कर फिर सतरंगी देश की कला के रंग मे रंगने निकल पड़ा
सतपुडा के घने जंगल, बेतुल का आदिवासी क्षेत्र का भ्रमण उनका जन जीवन और दरिद्रता देख जहां यह मन दुखित हुआ वही उनकी कला देख प्रफुल्लित भी हुआ ,ग्राम लालावादी के जूट शिल्पकारो का चयन, मिलन, प्रेम इस वर्ष की महत्वपूर्ण उपलब्धी रही !
तो वही होशीआरपुर , पंजाब का रंगीला कल्चर, वहा का भोजन भाषा और सत्कार ,अमृत्सर का गोलडन टेंपल, ऐतिहासिक फुलकारी और लकडी की नाक्काशी, एक साथ 250 शिल्पकारो से सिखाने के ऊदेश्य से रूबरू होना और बहुत कुछ सीख जाना और भी कयी खट्टे मीठे अनुभव से भरा यह अध्याय भी इस वर्ष फलदायी रहा !
फिर एक बार मेरा साउथ भारत से प्यार मुझे देश के सर्वश्रेष्ठ लोगो के पास लाया करनातका बेंगलूरू का मेट्रो जीवन का आनन्द ,चन्नापतन का अदभूत लकडी के खिलौने का शिल्प, मैसुरू शहर की रौनक, प्राकृतिक सौंदर्य के अकल्पनिय नजारे ,
तिरूपती बालाजी का अदवितिय् स्वरूप, तिरुमाला घाट के मनमोहक दृष्य, इडली डोसा टिफन, कालाहस्ती की कलमकारी,
और मादवमाला का लकडी की अदभूत नाक्काशी , साउथ भारत की ग्रामीण जीवन शैली, तेलूगु बागुनारुम, गाव वालो का " हिन्दी वाला भिया, दिल्ली वाला सार " संबोधन !
भारत भ्रमण के इस सिलसिले मे मेरी ज़िंदगी किसी रेलगाड़ी सी चली जा रही है, ज़िसकी मंजिल मैं नहीं ज़ानता बस मेरे देश की अदभूत कलाओ को जिन्दा रखने वाले हजारो लोगो का प्यार समेटते हुये चला जा रहा हू!
और बहुत सी मीठी यादो का यह वर्ष 2016 को नमन करते हुये अलविदा कहता हू और नव वर्ष मे एक नये उत्साह के साथ आदरणीय गुरूजनो, मम्मी पापा के आशिर्वाद और बहनो के प्यार के साथ एक नयी सुबह का स्वागत करता हू यह वर्ष आप सबके लिये खुशियो से भरा रहे ऐसी प्रार्थना करता हू!
जागेश   

Saturday, August 2, 2014

बिखरते  पन्ने 
विशाल पर्वताकार
क्यों मिले  न मिले ये 
सोचे थे ,समझे थे , संजोये थे 
सहमी सी आँखों में दिन  तरह 
शाम की गहराई तक पिरोये थे।

रंगो की दुनिया कलियों से बानी राहें 
राहें तकती राही  की 
गहरी  अंधियारी  बाहर भीतर
लागे काल कोठारी  सी।










हिल रही थी लौ दिया भी बुझ रहा था
तेज आंधी को जैसे अपशब्द कह रहा  था। 

तूफां के समंदर में तिनके का था सहारा 
तिनके का तैरना भी यहाँ किसको था गंवारा 
कल आई थी आंधी या रोज आती है आंधी 
गलती थी ये मेरी या उस  आसमां की 
वक़्त की थी ये खता या उन हसीं क्षणों  की 
जश्न था या मातम या कोई जलजला था 
बिखरते सपनो का या कोई सिलसिला था 

जो बिखर जाते हैं पन्ने मेरी जिंदगी के। 



- जागेश्वर 


Sunday, February 16, 2014


"दृष्टिकोण "

ख्वाब देखती निफ्ट मंडली , करती अपना सर्वस्व समर्पित
अपनी पूरी तन्मयता से, ख्वाब सजाती करती अर्पित।
बस यही सोचती है वो हर पल ,कैसे लगे भविष्य की आँख में काजल
फैशन जगत का केंद्र बिंदु अपना कार्यस्थल
विश्व का सर्वोच्च स्थान है अपना कल।

बस एक दशक की सीमा लाँघ ,
 देता विश्व को ख्याति और प्रतिष्ठा की ललकार
मेरे दृष्टिकोण में मेरा निफ्ट
भारतीय संस्कृति की मारता हुंकार


 बड़ी अट्टालिकाओं और आधुनिकता का  जो न हो मोहताज  
 मेरे दृष्टिकोण में ,
 नयी नयी तकनीको का कर स्वागत ,
 निफ्ट बदलता अपना आज।



मेरे दृष्टिकोण में मेरा निफ्ट प्रांगण ,किये सुशोभित कई आभूषण
हरे वस्त्रो का ऐसा है आवरण , जिसे देख खुश होता पर्यावरण
जिसे देख हँसता पर्यावरण।
कुछ करने कि होड़ में जब ये मंडली जुटती एक बार ,
नयी तकनीक और नए विचारो का लगता अम्बार
जिसे देख नतमस्तक होता  संसार।

देश विदेश के दूर सुदूर  में बसी कला को
उन्नत करने का सपना देखा है ,
अपने इस दृष्टिकोण में मैंने
हर कलाकार को अपना बनते देखा है

हम महनत और लगन से एक ऐसा बाजार सजायेंगे
जहाँ मिटटी भी होगी मूल्यवान ,
जिसे देख सभी करे गुणगान
फैशन जगत में हम  अपना परचम लहराएंगे
 हम निफ्ट को खूब सजायेंगे , हम निफ्ट को खूब सजायेंगे।

-
जागेश्वर 


Tuesday, February 4, 2014

"जी करता है"

जी करता है पंछी बन उड़ जाऊ,
उचाइयो तक जाकर उस नील गगन को छू पाऊ,
घूमू  उस आजाद गगन में।, सबका मन हर्षाऊ
 कलियाँ तो बहुत है इस दुनिया में , पर अपनी एक अलग पहचान बनाऊ
कुछ करू ऐसा जग में कि अपना नाम कर जाऊ 
मक बाप का नाम रोशन करके , गर्व से उनको भर पाऊ

कभी जी करता है , सागर कि लहरें  बन जाऊ
और उस सफलता के तट को बारम्बार छूती जाऊ
या फिर ऊचाई से बहते उस सुन्दर झरने से गिरकर
शीतल बहती नदिया संग मिलकर अपना लक्ष्य हासिल कर जाऊ \

कभी जी करता है , फलो कि मधुर सुगंध बनकर
सबको मंत्र मुग्ध कर जाऊ।
जीवन में खुशिया भरकर , सबको आनंदित कर जाऊ
या इंद्रधनुष बन कर बेरंग लोगो की दुनिया को सतरंगी कर जाऊ
जी करता है , कभी छत बनकर बेसहारो को सहारा दे पाउ
जो पार न कर पाये , उनका पुल बनकर नदिया पर कराऊ।
या कभी शीतल जल बनकर ,प्यासे की प्यास बुझाऊ।
या ठंडी ठंडी हवा बनकर में ,गर्मी से व्यथित लोगो को राहत पंहुचा पाऊ।

बुजुर्गो की लाठी बनकर में,ढेर सारा आशीर्वाद  पाऊ
या बच्चो का तोहफा बन उनके मन को हर्षाऊ।
जो रहते है दुखी , उनकी ख़ुशी बनकर मन को आनंद से भर जाउ ,
या रुमाल बनकर किसी के , आँसुओ को पूछ जाऊ।

पर डरता है मन मेरा भगवन कही बना न देना मुझको पैसा ,
कहीं किसी के घमंड का कारण न बन जाऊ
बना न देना मुझको वो ऐशो आराम ,
कि महनत क्या होती है वही भूल जाऊ।
किसी के खेतो कि फसल बनकर
हवा संग खूब झुमु और लहराऊ
चाँद सा सुन्दर मोती बनकर
किसी कि शोभा में बन जाऊ
या जगमग जगमग  सितारा बनकर
सबसे तेज झिलमिलाऊ ,
या कोई मधुर धुन बनकर कानो में मिश्री सी घुल जाऊ।
                                                           

                                                              - सौम्या अग्रवाल
                                                                  TD -4
                                                                निफ्ट भोपाल


Wednesday, August 7, 2013

लतिका


स्वछंद हवा  मे  , अनंत  आकाश मे
अपने  नयनो  मे भरपूर  उजाला भर
अपने पंखो को नयी ऊर्जा  से सक्षम कर
क्षितिज के उस पार , इतनी  ऊँची उड़ान भर
की सारा विश्व तुम्हे देखता ही रह जाये

उत्साह का ताना बना , साधना का बाना सजा
जीत का संसार बुन , गुनगुना अपनी ही धुन
ज़माने से न तू डर , सामना ह्रदय से कर
सम्पूर्ण आलेख मे कर अपने हस्ताक्षर

भटक तू आज दर बदर , मार्ग अपना प्रशस्त कर
सातों सागर पे अपना नाम लिख ,
 सातों आसमान पार कर
 जिसे देख सदियों तक लोग
मंत्रमुग्ध ही रह जाये

मन की वीणा के तार को
फिर एक बार झंकृत कर
स्वरमय बना  दे  कर्मभूमि  तू ,
बहने दे सुमधुर स्वर लहर
कि सारी सृष्टि उसके सम्मोहन मे डूब जाये
कि सारा विश्व तुम्हे देखता ही रह जाये

तुझ मे लक्ष्मी बाई है , वीरांगना अवंतिका
और दूसरी ओर तू ही ह , प्रेम पूरित लतिका
सबल कार्यकारिणी , प्रेम रूप धारिणी ,
सृष्टि की  जननी तू , संसार तुझ पे गर्विता

-जागेश

Thursday, April 25, 2013

फिर तेरी तस्वीर देखी ,  दिल मेरा तस्वीर हो गया ।

आंखे  तेरी  आशिक  हुई , मन मेरा फकीर  हो गया ॥