बिखरते पन्ने
विशाल पर्वताकार
क्यों मिले न मिले ये
सोचे थे ,समझे थे , संजोये थे
सहमी सी आँखों में दिन तरह
शाम की गहराई तक पिरोये थे।
रंगो की दुनिया कलियों से बानी राहें
राहें तकती राही की
गहरी अंधियारी बाहर भीतर
लागे काल कोठारी सी।
लागे काल कोठारी सी।
तेज आंधी को जैसे अपशब्द कह रहा था।
तूफां के समंदर में तिनके का था सहारा
तिनके का तैरना भी यहाँ किसको था गंवारा
कल आई थी आंधी या रोज आती है आंधी
गलती थी ये मेरी या उस आसमां की
वक़्त की थी ये खता या उन हसीं क्षणों की
जश्न था या मातम या कोई जलजला था
बिखरते सपनो का या कोई सिलसिला था
जो बिखर जाते हैं पन्ने मेरी जिंदगी के।
- जागेश्वर
