Straight from the core heart....

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Tuesday, April 3, 2012

क्या करें

हमारी नज़्म मे वो दर्द आता नहीं तो क्या करें,
दिल तोड़ कर बैठे हैं वफ़ा क्या करें ।

हमें तो धूप में भी छांव की ख्वाहिश नहीं,
तेरी जुल्फ़ों के साए की आशा क्या करें ।

खुशबू में तेरी बाहों की खोए इस तरह,
अब दिल बटोरें या दुआ करें ।

वफ़ा तुझसे ही नही, तेरी तस्वीर से भी है...
... अब उससे ही दर्द-ए-दिल बयां करें ।

तू दूर खुश है, खुश रह ’दीपक’,
अब नज़्म और सपनों मे हम जिया करें ।

                                                   -Deepak Tripathi

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