Straight from the core heart....

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Saturday, February 4, 2012

"फिर अमृत रस की बूँद पड़ी "


घनघोर अँधेरा मन में था मेरे ,
बड़ी बड़ी अट्टालिकाए मुझको थी घेरे
दिमाग पस्त था 
अनिश्चितता, असुरक्षा, और शंका के डेरे
गणित शिव की गण थी जैसे , और भौतकी भूत का रूप थी 
डूबा रहता था में रसायन शास्त्र के रस में जैसे वो प्रेमिका हो मेरी 
लक्ष्य मेरा था आँखों के सामने ,
में फसा हुआ था दल दल में ,
क्या सीखता था और  क्या सोचता था 
मन परिवर्तित होता था पल पल में 
मार्क्स भी पाता बेशुमार था 
पर अन्दर एक और बुखार था 
पेंटिंग ,स्केचिंग जान थी मेरी 
बेहद मुझको कला से प्यार था 
किंकर्तव्य विमूढ़ सा था मैं , जाता किस और 
एक रास्ता सीधा जाता था , एक जाता था कही ओर
माँ पिता का आशीर्वाद लेकर चल पड़ा मैं उस ओर
राधा कृष्ण की छवि निराली इंगित करती थी मुझको जिस ओर 
काम मिला मुझको मेरे मन का 
पायी मैंने एक उपलब्धि बड़ी 
गदगद हो उछला था मैं  ख़ुशी से 
जैसे हो "फिर अमृत रस की बूँद पड़ी "
                                 Jagesh  Jags 

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